शनिवार, 24 मार्च 2012
अब्राहम के वंशज हैं भारत के ब्राह्मण ?
शुक्रवार, 2 मार्च 2012
महर्षि विश्वामित्र
[छिपाएं] |
- विश्वामित्र राजा गाधि के पुत्र थे। हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार यह माना जाता है कि उन्होंने कई हज़ार वर्ष राज्य किया और फिर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकले।
- मार्ग में वसिष्ठ का आश्रम था। वसिष्ठ का आतिथ्य ग्रहण कर वे लोग चकित रह गये। वसिष्ठ के पास शबला नामक कामधेनु थी, जिसकी सहायता से उन्होंने अनेक प्रकार के व्यंजनों की व्यवस्था कर समस्त अक्षौहिणी सेना का अद्भुत सत्कार किया था। विश्वामित्र ने अनेक प्रलोभन देकर वसिष्ठ से शबला को मांगा, किंतु वसिष्ठ देने को तैयार न हुए। तब विश्वामित्र ने बलपूर्वक उस शबला को ले जाने का प्रयास किया। कामधेनु ने यह जानकर कि वसिष्ठ की इच्छा के बिना विश्वामित्र उन्हें अपने सैन्यबल के भय से ले जा रहे हैं, वसिष्ठ की आज्ञा से शक, यवन और कांबोज जाति के अनेक सैनिकों का बार-बार उत्पादन किया। विश्वामित्र के समस्त सैनिक मारे गये और वे स्वयं ही युद्ध करने के लिए उतरे। गौ की हुंकार के साथ उसके शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों से अनेक प्रकार के सैनिक उत्पन्न हुए। विश्वामित्र के सौ पुत्र भी वसिष्ठ से युद्ध करने के लिए बढ़े पर वसिष्ठ ने उन्हें भस्म कर डाला। अत्यंत लज्जित होकर विश्वामित्र ने अपने एक पुत्र को राज्य भार सौंपा और स्वयं शिव जी की तपस्या में लीन हो गये। शिव के वरदान से उन्होंने वेद, उपनिषद आदि समस्त विद्या तथा शस्त्र-ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने वसिष्ठ का आश्रम उजाड़ डाला। उनके शस्त्र-प्रयोग से रुष्ट हो वसिष्ठ ने अपना दंड उठाकर विश्वामित्र को चुनौती दी। उनके दंड के सम्मुख विश्वामित्र का क्षात्रबल परास्त हो गया और वे लज्जित होकर ब्राह्मणत्व की उपलब्धि के लिए तपस्या करने चले गये। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ एक हज़ार वर्ष तक तपस्या की तथा ब्रह्मा ने प्रकट होकर कहा-'हे राजर्षि, तुमने अपने तप से सब लोक जीत लिये हैं।' ब्रह्मा के मुंह से 'राजर्षि' शब्द सुनकर उन्हें बहुत बुरा लगा और विश्वामित्र ने सोचा कि उनकी तपस्या में अभी भी कुछ कमी है।[1]
मेनका और विश्वामित्र
तपस्या करते हुए सबसे पहले मेनका अप्सरा के माध्यम से विश्वामित्र के जीवन में काम का विघ्न आया। ये सब कुछ छोड़कर मेनका के प्रेम में डूब गये। जब इन्हें होश आया तो इनके मन में पश्चात्ताप का उदय हुआ। ये पुन: कठोर तपस्या में लगे और सिद्ध हो गये। काम के बाद क्रोध ने भी विश्वामित्र को पराजित किया।
त्रिशंकु और विश्वामित्र
राजा त्रिशंकु सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होने के कारण वसिष्ठ जी ने उनका कामनात्मक यज्ञ कराना स्वीकार नहीं किया। विश्वामित्र के तप का तेज़ उस समय सर्वाधिक था। त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गये। वसिष्ठ ने पुराने बैर को स्मरण करके विश्वामित्र ने उनका यज्ञ कराना स्वीकार कर लिया। सभी ऋषि इस यज्ञ में आये, किन्तु वसिष्ठ के सौ पुत्र नहीं आये। इस पर क्रोध के वशीभूत होकर विश्वामित्र ने उन्हें मार डाला। अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होने पर विश्वामित्र ने पुन: तप किया और क्रोध पर विजय करके ब्रह्मर्षि हुए। सच्ची लगन और सतत उद्योग से सब कुछ सम्भव है, विश्वामित्र ने इसे सिद्ध कर दिया।
रामचन्द्र और विश्वामित्र
श्री विश्वामित्र जी को भगवान श्रीराम का दूसरा गुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये दण्डकारण्य में यज्ञ कर रहे थे। रावण के द्वारा वहाँ नियुक्त ताड़का सुबाहु और मारीच जैसे- राक्षस इनके यज्ञ में बार-बार विघ्न उपस्थित कर देते थे। विश्वामित्र जी ने अपने तपोबल से जान लिया कि त्रैलोक्य को भय से त्राण दिलाने वाले परब्रह्म श्रीराम का अवतार अयोध्या में हो गया है। फिर ये अपनी यज्ञ रक्षा के लिये श्री राम को महाराज दशरथ से माँग ले आये। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हुई। इन्होंने भगवान श्री राम को अपनी विद्याएँ प्रदान कीं और उनका मिथिला में श्री सीता जी से विवाह सम्पन्न कराया। महर्षि विश्वामित्र आजीवन पुरुषार्थ और तपस्या के मूर्तिमान प्रतीक रहे। सप्तऋषि मण्डल में ये आज भी विद्यमान हैं।
क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व
पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के रूप में महर्षि विश्वामित्र के समान शायद ही कोई हो। इन्होंने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व प्राप्त किया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने, देवताओं और ऋषियों के लिये पूज्य बन गये और उन्हें सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही सबके लिये वे वन्दनीय भी बन गये। इनकी अपार महिमा है। इन्हें अपनी समाधिजा प्रज्ञा से अनेक मन्त्रस्वरूपों का दर्शन हुआ, इसलिये ये 'मन्त्रद्रष्टा ऋषि' कहलाते हैं।
- ऋग्वेद के दस मण्डलों में तृतीय मण्डल, जिसमें 62 सूक्त हैं, इन सभी सूक्तों (मन्त्रों का समूह) के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र ही हैं। इसीलिये तृतीय मण्डल 'वैश्वामित्र-मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में इन्द्र, अदिति, अग्निदेव, उषा, अश्विनी तथा ऋभु आदि देवताओं की स्तुतियाँ हैं और अनेक ज्ञान-विज्ञान, अध्यात्म आदि की बातें विस्तृत हैं, अनेक मन्त्रों में गौ-महिमा का वर्णन है। तृतीय मण्डल के साथ ही प्रथम, नवम तथा दशम मण्डल की कतिपय ऋचाओं के द्रष्टा विश्वामित्र के मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्र हुए हैं।
- वैसे तो वेद की महिमा अनन्त है ही, किंतु महर्षि विश्वामित्र जी के द्वारा दृष्ट यह तृतीय मण्डल विशेष महत्त्व का है, क्योंकि इसी तृतीय मण्डल में ब्रह्म-गायत्री का जो मूल मन्त्र है, वह उपलब्ध होता है। इस ब्रह्म-गायत्री-मन्त्र के मुख्य द्रष्टा तथा उपदेष्टा आचार्य महर्षि विश्वामित्र ही हैं। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त का दसवाँ मन्त्र 'गायत्री-मन्त्र' के नाम से विख्यात है, जो इस प्रकार है-
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥
- यदि महर्षि विश्वामित्र न होते तो यह मन्त्र हमें उपलब्ध न होता, उन्हीं की कृपा से, साधना से यह गायत्री-मन्त्र प्राप्त हुआ है। यह मन्त्र सभी वेदमन्त्रों का मूल है- बीज है, इसी से सभी मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिये गायत्री को 'वेदमाता' कहा जाता है। यह मन्त्र सनातन परम्परा के जीवन में किस तरह अनुस्यूत है तथा इसकी कितनी महिमा है, यह तो स्वानुभव-सिद्ध है। उपनयन-संस्कार में गुरुमुख द्वारा इसी मन्त्र के उपदेश से द्विजत्व प्राप्त होता है और नित्य-सन्ध्याकर्म में मुख्य रूप से प्राणायाम, सूर्योपस्थान आदि द्वारा गायत्री-मन्त्र के जप की सिद्धि में ही सहायता प्राप्त होती है। इस प्रकार यह गायत्री-मन्त्र महर्षि विश्वामित्र की ही देन है और वे इसके आदि आचार्य हैं। अत: गायत्री-उपासना में इनकी कृपा प्राप्त करना भी आवश्यक है। इन्होंने गायत्री-साधना तथा दीर्घकालीन संध्योपासना की तप:शक्ति से काम-क्रोधादि विकारों पर विजय प्राप्त की और ये तपस्या के आदर्श बन गये।
- महर्षि ने केवल वैदिक मन्त्रों के माध्यम से ही गायत्री-उपासना पर बल दिया, अपितु उन्होंने अन्य जिन ग्रन्थों का प्रणयन किया, उनमें भी मुख्य रूप से गायत्री-साधना का ही उपदेश प्राप्त होता है।
- 'विश्वामित्रकल्प,'
- 'विश्वामित्रसंहिता' तथा
- 'विश्वामित्रस्मृति' आदि उनके मुख्य ग्रन्थ हैं। इनमें भी सर्वत्र गायत्री देवी की आराधना का वर्णन दिया गया है और यह निर्देश है कि अपने अधिकारानुसार गायत्री-मन्त्र के जप से सभी सिद्धियाँ तो प्राप्त हो ही जाती हैं। इसीलिये केवल इस मन्त्र के जप कर लेने से सभी मन्त्रों का जप सिद्ध हो जाता है।
- महामुनि विश्वामित्र तपस्या के धनी हैं। इन्हें गायत्री-माता सिद्ध थीं और इनकी पूर्ण कृपा इन्होंने प्राप्त थी। इन्होंने नवीन सृष्टि तथा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग आदि भेजने और ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने-सम्बन्धी जो भी असम्भव कार्य किये, उन सबके पीछे गायत्री-जप एवं संध्योपासना का ही प्रभाव था।
- भगवती गायत्री कैसी हैं, उनका क्या स्वरूप है, उनकी आराधना कैसे करनी चाहिये, यह सर्वप्रथम आचार्य विश्वामित्र जी ने ही हमें बताया है। उन्होंने भगवती गायत्री को सर्वस्वरूपा बताया है और कहा है कि यह चराचर जगत स्थूल-सूक्ष्म भेद से भगवती का ही विग्रह है, तथापि उपासना और ध्यान की दृष्टि से उनका मूल स्वरूप कैसा है- इस विषय में उनके द्वारा रचित निम्न श्लोक द्रष्टव्य है, जो आज भी गायत्री के उपासकों तथा नित्य सन्ध्या- वन्दनादि करने वालों के द्वारा ध्येय होता रहता है- [2]'जो मोती मूँगा, सुवर्ण, नीलमणि तथा उज्ज्वल प्रभा के समान वर्णवाले पाँच मुखों से सुशोभित हैं। तीन नेत्रों से जिनके मुख की अनुपम शोभा होती है। जिनके रत्नमय मुकुट में चन्द्रमा जड़े हुए हैं, जो चौबीस वर्णों से युक्त हैं तथा जो वरदायिनी गायत्री अपने हाथों में अभय और वरमुद्राएँ, अंकुश, पाश, शुभ्रकपाल, रस्सी, शंख, चक्र और दो कमल धारण करती हैं, हम उनका ध्यान करते हैं'।
- इस प्रकार महर्षि विश्वामित्र का इस जगत पर महान उपकार ही है। महिमा के विषय में इससे अधिक क्या कहा जा सकता है कि साक्षात भगवान जिन्हें अपना गुरु मानकर उनकी सेवा करते थे। महर्षि ने सभी शास्त्रों तथा धनुर्विद्या के आचार्य श्रीराम को बला, अतिबला आदि विद्याएँ प्रदान कीं, सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान किया और भगवान श्रीराम की चिन्मय लीलाओं के वे मूल-प्रेरक रहे तथा लीला-सहचर भी बने।
- क्षमा की मूर्ति वसिष्ठ के साथ विश्वामित्र का जो विवाद हुआ, प्रतिस्पर्धा हुई, वह भी लोकशिक्षा का ही एक रूप है। इस आख्यान से गौ-महिमा, त्याग का आदर्श, क्षमा की शक्ति, तपस्या की शक्ति, उद्यम की महिमा, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की दृढ़ता, कर्मयोग, सच्ची लगन और निष्ठा एवं दृढ़तापूर्वक कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। इस आख्यान से लोक को यह शिक्षा लेनी चाहिये कि काम, क्रोध आदि साधना के महान बाधक हैं, जब तक व्यक्ति इनके मोहपाश में रहता है; उसका अभ्युदय सम्भव नहीं, किंतु जब वह इन आसुरी सम्पदाओं का परित्याग कर दैवी-सम्पदा का आश्रय लेता है तो वह सर्वपूज्य, सर्वमान्य तथा भगवान का प्रियपात्र हो जाता है। महर्षि वसिष्ठ से जब वे परास्त हो गये, तब उन्होंने तपोबल का आश्रय लिया, काम-क्रोध के वशीभूत होने का उन्हें अनुभव हुआ, अन्त में सर्वस्व त्याग कर वे अनासक्त पथ के पथिक बन गये और जगद्वन्द्य हो गये। ब्रह्मा जी स्वयं उपस्थित हुए, उन्होंने उन्हें बड़े आदर से ब्रह्मर्षिपद प्रदान किया। महर्षि वसिष्ठ ने उनकी महिमा का स्थापन किया और उन्हें हृदय से लगा लिया। दो महान संतों का अद्भुत मिलन हुआ। देवताओं ने पुष्पवृष्टि की।
- सत्यधर्म के आदर्श राजर्षि हरिश्चन्द्र महर्षि विश्वामित्र की दारुण परीक्षा से ही हरिश्चन्द्र की सत्यता में निखार आया, उस वृत्तान्त में महर्षि अत्यन्त निष्ठुर से प्रतीत होते हैं, किंतु महर्षि ने हरिश्चन्द्र को सत्यधर्म की रक्षा का आदर्श बनाने तथा उनकी कीर्ति को सर्वश्रुत एवं अखण्ड बनाने के लिये ही उनकी इतनी कठोर परीक्षा ली। अन्त में उन्होंने उनका राजैश्वर्य उन्हें लौटा दिया, रोहिताश्व को जीवित कर दिया और महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा रूपी कृपा प्रसाद से ही हरिश्चन्द्र राजा से राजर्षि हो गये, सबके लिये आदर्श बन गये।
- ऐतरेय ब्राह्मण आदि में भी हरिश्चन्द्र के आख्यान में महर्षि विश्वामित्र की महिमा का वर्णन आया है।
- ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में 30वें, 33वें तथा 53वें सूक्त में महर्षि विश्वामित्र का परिचयात्मक विवरण आया है। वहाँ से ज्ञान होता है कि ये कुशिक गोत्रोत्पन्न कौशिक थे। [3] ये कौशिक लोग महान ज्ञानी थे, सारे संसार का रहस्य जानते थे। [4]
- ऋग्वेद 53वें सूक्त के 9वें मन्त्र से ज्ञात होता है कि महर्षि विश्वामित्र अतिशय सामर्थ्यशाली, अतीन्द्रियार्थद्रष्टा, देदीप्यमान तेजों के जनयिता और अध्वर्यु आदि में उपदेष्टा हैं तथा राजा सुदास के यज्ञ के आचार्य रहे हैं।
महाभारत और पुराणों में विश्वामित्र
महर्षि विश्वामित्र के आविर्भाव का विस्तृत आख्यान पुराणों तथा महाभारत आदि में आया है। भरत वंश की परंपरा राजा अजमीढ़, जह्नु, सिंधुद्वीप, बलाश्व, बल्लभ, कुशिक से होती हुई गाधि तक पहुंची। गाधि दीर्घकाल तक पुत्रहीन रहे तथा अनेक पुण्यकर्म करने के उपरांत उन्हें सत्यवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। च्यवन के पुत्र भृगुवंशी ऋचीक ने सत्यवती की याचना की तो गाधि ने उसे दरिद्र समझकर शुल्क रूप में उससे एक सहस्त्र श्वेत वर्ण तथा एक ओर से काले कानों वाले एक सहस्त्र घोड़े मांगे। ऋचीक ने वरुणदेव की कृपा से शुल्क देकर सत्यवती से विवाह कर लिया। कालांतर में पत्नी से प्रसन्न होकर ऋचीक ने वर मांगने को कहा। सत्यवती ने अपनी मां की सलाह से मां के तथा अपने लिए एक-एक पुत्र की कामना की। *ऋचीक ने सत्यवती को दोनों के खाने के लिए एक-एक मन्त्रपूत चरु दिया तथा ऋतुस्नान के उपरांत मां को पीपल के वृक्ष का आलिंगन तथा सत्यवती को गूलर का आलिंगन करने को कहा। मां ने यह सोचकर कि अपने लिए निश्चय ही ऋचीक ने अधिक अच्छे बालक की योजना की होगी, बेटी पर अधिकार जमाकर चारू बदल लिए तथा स्वयं गूलर का और सत्यवती को पीपल का आलिंगन करवाया। गर्भवती सत्यवती को देखकर ऋचीक पर यह भेद खुल गया। उसने कहा-'सत्यवती, मैंने तुम्हारे लिए ब्राह्मण पुत्र तथा मां के लिए क्षत्रियपुत्र की योजना की थी।' सत्यवती यह जानकर बहुत दुखी हुई। उसने ऋचीक से प्रार्थना की कि उसका पौत्र भले ही क्षत्रिय हो जाय, पर पुत्र ब्राह्मण हो। यथासमय सत्यवती की परम्परा में पुत्र रूप में जमदग्नि पैदा हुए और उन्हीं के पुत्र परशुराम हुए। जमदग्नि तथा गाधि नामक विख्यात राजा को विश्वामित्र नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। गाधि ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर अपने शरीर का त्याग कर दिया। प्रजा के मन में पहले से ही संशय था कि विश्वामित्र प्रजा की रक्षा कर पायेंगे कि नहीं। कालांतर में स्पष्ट हो गया कि वे गाधि जितने समर्थ राजा नहीं हैं। प्रजा राक्षसों से भयभीत थी, अत: विश्वामित्र अपनी सेना लेकर निकले।
- वे वसिष्ठ के आश्रम के निकट पहुंचे। वसिष्ठ उनके सैनिकों को अन्याय आदि करते देख उनसे रुष्ट हो गये तथा अपनी गौ नंदिनी से उन्होंने भयानक पुरुषों की सृष्टि करने के लिए कहा। उन भयानक पुरुषों ने राजसैनिकों को मार भगाया। अपनी पराजय देखकर विश्वामित्र ने तप को अधिक प्रबल मानकर तपस्या में अपना मन लगाया। वे ब्रह्माजी के सरोवर से उत्पन्न हुई सरस्वती नदी के तट पर चले गये। वहां उन्होंने अर्ष्टिषेण तीर्थ का सेवन कर ब्रह्मा से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। कालांतर में तपस्या करते हुए उनको वसिष्ठ से स्पर्धा तदनंतर बैर हो गया। सरस्वती के पूर्वी तट पर वसिष्ठ तथा पश्चिमी तट पर विश्वामित्र तपस्या में लगे थे। एक दिन उन्होंने सरस्वती को बुलाकर कहा कि वह वसिष्ठ को बहाकर उनके पास ले आये ताकि वे वसिष्ठ का वध कर पायें। सरस्वती दोनों में से किसी का भी अहित करने से शाप की संभावना का अनुभव कर रही थी, अत: उसने वसिष्ठ से जाकर सब कह सुनाया। उन्होंने उसे विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करने के लिए कहा। सरस्वती ने पूर्वी तट को तोड़कर बहाया तथा उस तट को वसिष्ठ सहित विश्वामित्र के पास पहुंचा दिया। विश्वामित्र जप और होम कर रहे थे। वे वसिष्ठ को मारने के लिए कोई अस्त्र ढूंढ़ ही रहे थे कि सरस्वती ने पुन: बहाकर उन्हें दूसरे तट पर पहुंचा दिया। वसिष्ठ को फिर से पूर्वी तट पर देख विश्वामित्र सरस्वती से रुष्ट हो गये। उन्होंने शाप दिया कि वहां उसका जल रक्तमिश्रित हो जाये। उस स्थल पर सरस्वती का जल रक्त की धारा बन गया तथा उसका पान विभिन्न राक्षस इत्यादि करने लगे। कालांतर में कुछ मुनि तीर्थाटन करते हुए वहां पहुंचे। वहां रक्त देख तथा सरस्वती से समस्त घटना के विषय में जानकर उन लोगों ने शिव की उपासना की। उनकी कृपा से शापमुक्त होकर सरस्वती पुन: स्वच्छ जल-युक्त हो गयी। जो राक्षस निरंतर प्रवाहित रक्त का पान कर रहे थे, वे अतृप्त और भूखे होने के कारण मुनियों की शरण में गये। उन्होंने अपने पापों को मुक्त कंठ से स्वीकार किया तथा उनसे छुटकारा प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। उन्हें पापमुक्त करने की मुनियों की इच्छा जानकर सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता 'अरुणा' को ले आयी। उसके जल में स्नान करके राक्षस अपने शरीर का त्याग कर स्वर्ग चले गये। अरुणा ब्रह्महत्या का निवारण करनेवाली नदी है।
- त्रेता युग और द्वापर युग की संधि के समय बारह वर्ष तक अनावृष्टि रही। विश्वामित्र भूख से पीड़ित हो अपने परिवार को जनसमुदाय में छोड़कर भक्ष्य-अभक्ष्य ढूंढ़ने निकल पड़े। उन्हें एक चांडाल के घर में कुत्ते की जांघ का मांस दिखायी दिया। वे उसे चुराने की इच्छा से वहीं रह गये। रात्रि के समय यह सोचकर कि सब सो रहे हैं, वे घर में घुसे। चांडाल जगा हुआ था। अत: उसने पूछा, कौन है। परिचय पाकर तथा प्रयोजन जानकर उसने उन्हें इस कुकर्म से विरक्त होने के लिए कहा। यह भी कहा कि मुनि के लिए कुत्ते की जांघ का मांस अभक्ष्य है। विश्वामित्र ने आपत्धर्म मानकर वह मांस वहां से ले लिया तथा अपने परिवार के साथ भक्षण करने का विचार किया। मार्ग में उन्हें ध्यान आया कि इसमें से यज्ञादि के द्वारा देवताओं का भाग भी निकाल देना चाहिए। उनके यज्ञ करते-करते ही वर्षा प्रारंभ हो गयी तथा दुर्भिक्ष दूर हो गया। [5]
- विश्वामित्र ने अपने सातों लड़कों से रुष्ट होकर उन्हें अपने आश्रम से निकाल दिया तथा शाप दिया। वे गर्ग मुनि को गुरु बनाकर रहने लगे। मुनि के पास एक गाय थी। वह हर साल एक बच्चा देती थी। एक दिन उसे जंगल से लाने गये तो सातों ने सबसे छोटे की सलाह से पितरों का आवाहन करके श्राद्ध निमित्त उस गाय को मारकर खा लिया तथा मुनि से यह कह दिया कि सिंह उसे खा गया है। मुनि ने मान लिया। गाय मारते हुए पितरों का आवाहन करने के कारण वे ज्ञान से च्युत नहीं हुए। पाप कर्म के कारण वे मरकर व्याध के घर में पैदा हुए। इसी प्रकार वे क्रमश: हरिण, चकवा-चकवी, हंस हुए, तदनंतर उनमें से चार ब्राह्मण घर में उत्पन्न हुए और जो राजा बनने के लोभी थे, वे राजा ब्रह्मदत्त और उसके दो मन्त्रियों के रूप में जन्मे। गोवध करते हुए भी पितरों का आवाहन करने के कारण वे अपने पूर्वज्ञान को भूले नहीं। राजा ब्रह्मदत्त की पत्नी राजा से काम-संबंध स्थापित नहीं करती थी। उसे सब ज्ञात था और वह राजा को धर्म के मार्ग की ओर अग्रसर करना चाहती थी। संयोग से चार ब्राह्मण भाई तीर्थाटन के लिए उद्यत हुए तो उन्होंने अपने बूढ़े पिता के हाथ राजा और मन्त्रियों को पूर्वजन्म का आख्यान लिख भेजा। राजा ने ब्राह्मण को धन देकर विदा किया तथा अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर वह योग की ओर प्रवृत्त हुआ। मन्त्रियों ने भी वही मार्ग अपनाकर मुक्ति प्राप्त की। इस प्रकार विश्वामित्र के सातों पुत्रों की इहलोक से मुक्ति हुई। इसका श्रेय पितरों की भक्ति को दिया गया है। [6]
- Source :
मख का अर्थ यज्ञ भी होता है
विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥209॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥1॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥2॥
मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥3॥
भगति हेतु बहुत कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥4॥
धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥5॥
Source : http://akhtarkhanakela.blogspot.in/2012/02/blog-post_8940.html
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012
सोमयाग : महत्त्व एवं प्राचीनता
-सूर्यकांत बाली

सतयुग के भारतीयों का, चाहे वे आम लोग रहे हों या फिर राज परिवारों के लोग रहे हों, सोमयाग एक बहुत ही प्रिय यज्ञ रहा है। यज्ञ के नाम से जिस संस्था से हमारा परिचय रहा है वह क्रमश: काफी जटिल और महंगी होती चली गई थी। मनु महाराज ने जब प्रकृति के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरित होकर यज्ञ नामक पद्धति की शुरूआत की थी, उसमें शुद्ध रूप से यही भाव निहित था कि जो प्रकृति हमें इतना दे रही है, हम भी उसे बदले में अपना कुछ दें।
अर्थात् वह हमारी रक्षा कर रही है, हमारा पालन-पोषण कर रही है, हमें जीवन दे रही है, हम भी उसकी रक्षा की सोचें, उसके स्वरूप को विकसित करें, उसके जीवन का विस्तार करें। बिना दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित हुए हम उसके बारे में इस हद तक कहीं सोच सकते हैं भला?
अग्नि को प्रकृति का प्रतिनिधि मानकर, उसमें डाली जाने वाली आहुति को हमारे समर्पण भाव का प्रतीक मानकर जो यज्ञ शुरू हुआ उसमें क्रमश: फैलाव होता गया, विविधता आती गई, जटिलता आती गई। यानी, यज्ञ नामक एक सरल प्रक्रिया क्रमश: एक संस्था बन गई, कर्मकाण्ड बन गया। वैसा क्यों हुआ, यह निश्चित ही शोध और विचार का विषय है। पर प्रारम्भ में ही इस यज्ञ संस्था के साथ दो चीजें अचानक जुड़ गईं। एक ओर जहां अग्नि में आहुति डालते वक्त कुछ बोलना भी चाहिए, इस स्वाभाविक इच्छा की पूर्ति यजुष मन्त्रों की रचना और यज्ञों में उनके उच्चारण के रूप में हुई जो मन्त्र आगे चलकर यजुर्वेद में संकलित हुए, वहां सोमरस का भी आहुति के रूप में उपयोग काफी पहले शुरू हो गया। चूंकि जिसके प्रति पूरा समर्पण हो, लगाव हो उसे हम अपना अतिमहत्वपूर्ण, सर्वस्व दे देना चाहते हैं, इसलिए लगता है कि सोम का स्थान हमारे पूर्वजों के जीवन में काफी ज्यादा और काफी महत्वपूर्ण था कि यज्ञ संस्था के शुरू होते ही जो यज्ञ या याग सबसे पहले कुछ आकार ग्रहण कर सका उसका नाम था सोमयाग।
आज हम नहीं जानते कि सोम शब्द का अर्थ क्या है। इसलिए हम उसे कभी शराब तो कभी दूसरे नशीले पेय के साथ जोड़कर देखते हैं। ऐसा कुछ नहीं है। पर ऐसा कुछ न होते हुए भी सोम एक ऐसा पेय जरूर रहा होगा जो थकान दूर करने में मदद करता होगा और अत्यधिक प्रयोग में आने के बावजूद जो सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक रहा होगा। इसीलिए जहां अग्नि को कुछ समर्पित करने की इच्छा पैदा हुई तो सबसे पहली निगाह सोम पर पड़ी और सोमयज्ञ हमारा सबसे पहला यज्ञ बन गया।
जो हमें पसन्द है वह हमारे देवताओं को भी पसन्द है, इस आधार पर आगे चलकर हम मन्त्र पढ़कर देवताओं को सोम समर्पित करने लगे। क्रमश: जैसे यज्ञों में इन्द्र की स्तुति का महत्व बढ़ा तो कुछ ऐसी छवि बना दी गई कि इन्द्र को सोम बहुत पसन्द है। बात यहां तक बढ़ गई कि अन्तत: खुद सोम को ही एक देवता मानकर उसके बारे में मन्त्र लिखे जाने लगे और यह बात इस कदर रेखांकित हुई कि मुनि वेदव्यास ने जब वेदों को (आज उपलब्ध) अन्तिम आकार दिया तो उन्होंने ऋग्वेद के एक पूरे मंडल को, नौवें मंडल को ही सोम मंडल बनाकर सोम संबंधी तमाम सूक्त उसमें संकलित कर दिए।
तो क्या था सोम? जाहिर है कि वह सोमरस था, पर वह रस कैसे बनता था, इसकी जानकारी चाहिए तो ऋग्वेद के सोम संबंधी मन्त्र इसमें काफी सहायता करते हैं। ऋग्वेद का नौवां मंडल, जिसमें कुल मिलाकर 113 सूक्त सिर्फ सोम को लेकर ही लिखे गए हैं, सोम के बारे में जानकारी नहीं देंगे तो और क्या करेंगे? मसलन एक मन्त्र (9.5.4) कहता है कि सोम एक लता या एक घास जैसा है और काफी समय से देवताओं की बलप्राप्ति का साधन रहा है, बर्हि: प्रत्वीनमोजसा, पवमान: स्तृणान् हरि: देवेषु देव ईयते। जैसा कि इस मन्त्र में संकेत है, सोम की बेल हरे (हरि:) रंग की थी और यह बात नौवें मंडल में अनेक स्थानों पर लिखी है। पर कहीं-कहीं उसे भूरे या लाल रंग का भी कहा गया है। नौवें मंडल की मन्त्र संख्या 11.4 में उसके दोनों रंगों का उल्लेख है-बभ्रवे नु स्वतवसे, अरुणा दिविस्पृशे, सोमाय गाथमर्चत। सोम की बेल को बढ़ने के लिए पानी की भारी जरूरत रहती थी। इसलिए पहाड़ों पर यह बेल जमीन के अन्दर ही अन्दर कहीं बढ़ती रहती होगी अव्यो वारे परि प्रियो हरिर्वनेषु सीदति, रेभो वनुष्यते मती (9.8.6)।
सोम के इस हरे रंग की बेल को, जो कई बार पक कर भूरे या लाल रंग की हो जाया करती थी, पीसने का बड़ा ही सुन्दर वर्णन नौवें मंडल के मन्त्रों में मिलता है जिसका अर्थ इतना ही है कि सोम रस निकालने की इस प्रक्रिया में हमारे पूर्वज कितना मजा लेते रहे होंगे। सोम को हाथों की उंगलियों से ही पीसते और निचोड़ते थे। इन दस उंगलियों के कई तरह के अलंकारिक वर्णन इस नौवें मंडल में दिए गए हैं। इसे ऊखल में मूसल की मदद से और ग्राव यानी पत्थर पर कूटने के विवरण भी खूब मिलते हैं। चूंकि इस काम में दसों उंगलियों की जरूरत पड़ती है, इसलिए कहीं इन दस उंगलियों को सोम की माताएं तो कहीं इसकी बहनें कह दिया गया है।
सोम का रस निकालने के बाद इसमें दूध से बने पदार्थ और शहद मिलाकर इसे स्वादिष्ट बनाते थे, इसके भरपूर संकेत ऋग्वेद के नौंवे मंडल में मिल जाते हैं। मसलन यद् गोभिर्वासियिष्यसे (2.4) संगोभिर्वासियामसि (8.5) या मृजान: गोभि: श्रीणान: (119,17) सरीखे मन्त्रों में सोमरस में दूध से बने पदार्थों को मिलाने की बात है तो मन्त्र संख्या 5.10 में इसमें शहद मिलाने की बात कही गई है-वनस्पतिं पवमान मह्वासमंखि धारय। ऐसे सोमरस की बहती धार को देखकर हमारे पूर्वज खुशी से नाच उठते थे और धारा का ही वर्णन कर उसे कभी सहस्त्रधार तो कभी कुछ कहने लगते-सोम: पुनानो अर्षति सहस्त्रधारो अत्यवि: (9.13.1) पवनो वाजसातये सो न: सहस्त्रयाजस: (9.13.3) असर्जि वाजीतिर: पवित्रामिन्द्राय सोम: सहस्त्रधार: (9.109.19) इत्यादि।
सोम के इस तमाम वर्णन का मतलब या उद्देश्य आखिर क्या है? यह बताना उचित ही है कि सोमयज्ञ इसलिए हमारा पहला और सरल यज्ञ बना क्योंकि सोम की हमारे पूर्वजों के जीवन में कुछ खास जगह बन चुकी थी। ऐसा सोमरस मादक जरूर था और खुद ऋग्वेद उसे बार-बार वैसा कहता है-अभित्यम् मद्यं मदमिन्दो इन्द्र इति क्षर अभिवाजिनो अर्वत: (9.6.2)। पर जाहिर है कि न तो सोमरस शराब थी जो कि किसी भट्टी में या जमीन में गाड़ कर बनाई जाती है और न ही इसमें वैसा नशा था। पर नशा कुछ न कुछ था, इसके बारे में बहुत मिलता है। इन्द्र हमारे पूर्वजों का प्रिय देवता रहा है और किसी भी अन्य देवता की तुलना में इन्द्र को सोमरस बहुत प्रिय था, ऐसा बार-बार आता है।
बल्कि यहां तक कह सकते हैं कि अकेले इन्द्र को ही सोमरस इस कदर पसन्द था कि इस देवता को आगे चलकर ब्राह्मणग्रन्थों और पुराणों में बहुत ही घटिया चरित्र का और निरन्तर अप्सराओं के बीच रहने वाला बताया गया। ऐसे इन्द्र के तिरस्कार और परित्याग की शुरूआत तो द्वापर युग के अन्त में खुद कृष्ण ने ही कर दी थी, जिन्होंने इन्द्र पूजा को छोड़ गोवर्धन पूजा की परम्परा का सूत्रपात किया। बाद में लिखे गए ब्राह्मण ग्रन्थों और पुराणों में इसी धारणा को आगे बढ़ाया गया। अब ऐसे इन्द्र की भला कौन प्रशंसा करेगा जो सोम की तलाश में पागलों की तरह घूमता हुआ चिल्ला रहा है कि हाय, कहीं से सोम पीने को मिल जाए तो उसे पीकर मैं इस पृथ्वी को (एक गेंद की तरह) यहां पटक दूं या वहां पटक दूं- हन्ताहं पृथिवीमिमां, निदधानीहवेहवा, कुवित्सोमस्यापाम् (10.119.9)।
आज जैसी शराब न होने पर भी अगर सोमरस में नशा था तो उसका हश्र क्या हो सकता है, यह ऋग्वेद के आखिरी रचना-वर्षों में लिखे लब ऐष के ऊपर उद्धृत सूक्त (10.119) से और कृष्ण द्वारा एक झटके में इन्द्र की पूजा सफलता पूर्वक बन्द करवा देने की घटना से मालूम पड़ जाता है। पर चूंकि कभी सोमयाग, जो शुरू में सिर्फ सुबह से वक्त होता था, फिर बढ़ते-बढ़ते एक दिन, दो दिन, तीन दिन तक फैल गया, हमारे पूर्वजों का एक सहज, सरल और मनपसन्द यज्ञ था और सोमरस उनका मनपसन्द पेय, तो इस बारे में दो-एक जरूरी बातें और जान ली जाएं। ऋग्वेद (10.34.1) में ऋषि कवष ऐलूष ने महत्वपूर्ण सूचना देते हुए सोम को मौजवत (सोमस्येव मौजवतस्य भक्ष:) यानी मूजवान पर्वत से प्राप्त हुआ कहा है। तो सवाल है कहां है यह मूजवान पर्वत जहां से सोमबेल लाई जाती थी? चूंकि सोम नामक देवता हओम के रूप में पुराने ईरानियों में बहुत ज्यादा लोकप्रिय था, इसलिए शोधकर्ताओं ने इस पर्वत को भारत के पश्चिम (यानी पश्चिमोत्तर) में कहीं माना है।
पर सोमयाग से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सन्दर्भ हम सबसे अन्त में कहना चाहते हैं। वेद में सोम को इन्दु कहा गया है। दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। कोई गिनती करे तो शायद दोनों शब्दों का एक दूसरे के पर्यायवाची के रूप में लगभग बराबर प्रयोग वेद में हुआ होगा। दोनों इस हद तक पर्यायवाची हो गए कि जब इन्दु का अर्थ चन्द्रमा हो गया तो सोम का अर्थ भी चन्द्रमा हो गया। मसलन सोमवार यानी चन्द्रवार, जो रविवार यानी सूर्यवार के बाद आता है। जहां यह बेल मिलती थी वहां इसे सोम कहते थे और चूंकि हम इसको निचोड़ते थे इसलिए हम इसे इन्दु (निचड़ा हुआ) कहते थे। सोम बेल चूंकि भारत के बाहर से लाई जाती थी इसलिए जो लोग यहां से सोम लेने मूजवान पर्वत जाते थे उन्हें इन्दु खरीदने वाले या इन्दु कह दिया जाता होगा और यह बात बिल्कुल स्वाभाविक नजर आती है।
इस आधार पर कुछ शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि हम भारतीयों के लिए हिन्दू शब्द सिन्धु के आधार पर बाद में और इस इन्दु के आधार पर पहले ही चल पड़ा होगा। ठीक इसी आधार पर यह निष्कर्ष भी निकाला गया है (प्रा. ह. रा. दिवेकर, 1970) कि जिसे हम आज हिन्दूकुश पर्वत कहते हैं वही कभी मूजवान रहा होगा और हम इन्दुओं के सोमप्राप्ति के लिए वहां बार-बार जाने के कारण उसका नाम इन्दु के साथ जुड़ गया होगा।
बस इसमें एक ही आशंका बाकी बचती है। इन्दु के कारण हमारा नाम हिन्दू पड़ गया, यह बात समझ में आती है। बात यह भी समझ में आती है कि इस इन्दु के आधार पर मूजवान पर्वत इन्दुवान या हिन्दूवान बन गया हो। पर वह हिन्दूकुश कब बना? यहां कुश का अर्थ है संहार। यानी कभी उस पर्वत पर इन्दु लेने गए इन्दुओं ने वहां के लोगों का संहार किया या वहां के लोगों ने इन्दुओं का संहार किया जिससे तीन बातें हुई होंगी। एक पड़ाव का नाम हिन्दूकुश पड़ गया। दो, इस घटना के बाद इन्दु यानी सोम का भारत आना बन्द हो गया होगा और तीन, खरीददार न रहने से सोमबेल की देखरेख बन्द हो गई और वह लुप्त हो गई। ये सब अनुमान हैं, जो सही लगते हैं। पर सही ही हैं, इसके लिए शोध चाहिए। सोमयाग पर शोध हुआ तो निष्कर्ष इस हद तक महत्वपूर्ण होंगे।
Source: http://www.bhartiyapaksha.com/?p=7861
सोमवार, 20 फ़रवरी 2012
महाभारत युद्ध के चश्मदीद थे बर्बरीक - पं. केवल आनंद जोशी
पं. केवल आनंद जोशी
पृष्ठभूमि... पांडवों में महाबली भीम को अज्ञातवास के दौरान हिडिम्बा से प्रणय सम्पर्क हुआ और उससे महाबलि घटोत्कच का जन्म हुआ। वैसे तो तब यह एक अमान्य प्रेम सम्बन्ध था और हिडिम्बा ने बहुत बाद में घटोत्कच को बताया कि तेरे पिता महाबलि भीमसेन हैं जो पांच पांडव में से एक हैं। घटोत्कच भी भीम की तरह महान बलशाली, विशालकाय और माता हिडिम्बा की तरह मायावी शक्तियों से युक्त था जिसने बाद में युद्ध के दौरान पांडवों का साथ दिया और वीरगति प्राप्त की। घटोत्कच का एक पुत्र था बर्बरीक, जो शक्तिबल के अलावा शिवभक्ति में भी अगाथ आस्थावान रहा। प्रसन्न होकर शिवजी ने उसको तीन अमोघवाण दिए जिससे वह तीनों लोकों में प्रयोग करके अजेय योद्धा बन सकता था। लेकिन उसके यह अमोघवाण और सूर्य भगवान का दिया धनुष आज उसके सिरोभाग के साथ महज एक प्रतीकमूर्ति बनकर रह गया। युद्ध के दौरान वासुदेव कृष्ण ने कुछ ऐसी लीला रची कि बर्बरीक को अपना सिर दान करना पड़ा और वह कृष्ण के श्यामरूप में युद्धस्थल के पास खाटू में अमर हो गये और यही श्याम बाबा उस महाभारत के धर्मयुद्ध के चश्मदीद गवाह कैसे बने...? आगे पढ़ें।
कैसे बने श्यामबाबा खाटू के
हमारे देश में बहुत से ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक है राजस्थान का प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर। इस मंदिर में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की श्याम यानी कृष्ण के रूप में पूजा की जाती है। इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है उन्हें श्यामबाबा का नित नया रूप देखने को मिलता है। कई लोगों को तो इस विग्रह में कई बदलाव भी नजर आते है। कभी मोटा तो कभी दुबला। कभी हंसता हुआ तो कभी ऐसा तेज भरा कि नजरें भी नहीं टिक पातीं। श्यामबाबा का धड़ से अलग शीष और धनुष पर तीन वाण की छवि वाली मूर्ति यहां स्थापित की गईं। कहते हैं कि मन्दिर की स्थापना महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद स्वयं भगवान कृष्ण ने अपने हाथों की थी।
बालक बर्बरीक यानी श्यामबाबा के बारे में मान्यता है कि यह बाल्यकाल से ही बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे तीन अभेद्य वाण प्राप्त किए थे। इसी कारण इन्हें तीन वाण धारी नाम भी प्राप्त हुआ। स्वयं अग्निदेव ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें ऐसा धनुष प्रदान किया था, जिससे वह तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य रखते थे। जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ तो बर्बरीक ने भी माता के सामने इस युद्ध में जाने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने माता से पूछा- इस युद्ध में मैं किसका साथ दूं? माता ने सोचा कौरवों के साथ तो उनकी विशाल सेना, स्वयं भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, अंगराज कर्ण जैसे महारथी हैं। इनके सामने पांडव अवश्य ही हार जाएंगे। ऐसा सोच माता बालक बर्बरीक से बोलीं- पुत्र, जो हार रहा हो तुम उसी का सहारा बनना। बालक बर्बरीक ने माता को वचन दिया कि वह ऐसा ही करेंगे। अब वह अपने लीले (नीले) घोड़े पर सवार हो युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान कर गए।
अंतर्यामी, सर्वव्यापी भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का अंत जानते थे। इसीलिए उन्होंने सोचा कि अगर कौरवों को हारता देखकर बर्बरीक कौरवों का साथ देने लगा तो पांडवों की हार निश्चित है। इसलिए लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर चालाकी से बालक बर्बरीक का शीश दान में मांग लिया। बालक बर्बरीक सोच में पड़ गया कि कोई ब्राह्मण मेरा शीश क्यों मांगेगा? ऐसा सोच उन्होंने ब्राह्मण से उनक��� वास्तविक रूप में दर्शन की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रूप के दर्शन कराए। बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने शीषदान के बदले सम्पूर्ण युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की। भगवान बोले- ऐसा ही होगा। ऐसा सुन बालक बर्बरीक ने अपने आराध्य देवी-देवताओं का वन्दन किया। माता को नमन किया और फिर कमर से कटार खींचकर एक ही वार में अपने शीश को धड़ से अलग कर श्रीकृष्ण को दान कर डाला। श्रीकृष्ण ने तेजी से उनके शीश को अपने हाथ में उठा लिया एवं अमृत से सींचकर अमर करते हुए युद्ध भूमि के समीप ही सबसे ऊंची पहाड़ी पर एक पेड़ की शाखा पर सुशोभित कर दिया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध देख सकते थे।
महाभारत का युद्ध शुरू हुआ। बर्बरीक मौन हो सब देखते रहे। युद्ध की समाप्ति पर कौरवों का अंत हुआ और पांडव विजयी हुए। सभी आत्मप्रशंसा में लग गए कि उन्हीं के कारण विजय प्राप्त हुई है। आखिरकार निर्णय के लिए सभी श्रीकृष्ण के पास गये। भगवान श्रीकृष्ण बोले- मैं तो स्वयं व्यस्त था। इसीलिए मैं किसी का पराक्रम नहीं देख सका। ऐसा करते हैं हम सभी भीम के पौत्र बर्बरीक के पास चलते हैं। वहीं से सही निर्णय मिल सकेगा। बर्बरीक के शीशदान की कहानी अब तक पांडवों को मालूम नहीं हुई थी। बर्बरीक के पास पहुंच कर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे पांडवों के पराक्रम के बारें में जानना चाहा। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया - भगवन युद्ध में तो चारों ओर आपका सुदर्शन नाच रहा था और जगदम्बा खप्पर भर-भर लहू का पान कर रहीं थीं। मुझे तो ये पांडव लोग विशेष पराक्रम दिखाते कहीं भी नजर नहीं आए सिवाय मेरे दादा भीम के जिन्होंने कुछ ही देर में दुर्योधन का लहू निकाला और दुषासन के हाथ उखाड़ डाले। बर्बरीक के उत्तर को सुन सभी महारथियों की नजरें नीचे झुक गईं। तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक का सभी से परिचय कराया कि यही वीर घटोत्कच का पुत्र और भीम का पोता है, जिसको शिवजी ने तीन अचूक मार करने वाले वाण दिये और अग्निदेव ने अजेय धनुष दिया है। उसी समय श्रीकृष्ण ने बर्बरीक पर प्रसन्न होकर उन्हें अपना नाम श्याम दिया तथा अपनी सोलह कलाएं दीं।
अपनी शक्तियां प्रदान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण बोले- बर्बरीक धरती पर तुम से बड़ा दानी ना तो कोई हुआ है और ना ही होगा। मां को दिए वचन के अनुसार... तुम इस पृथ्वी पर हारे का सहारा बनोगे। कल्याण की भावना से जो लोग तुम्हारे दरबार में तुमसे जो भी मांगेंगे उन्हें वह अवश्य मिलेगा। तुम्हारे दर पर सभी की इच्छाएं पूर्ण होंगी ऐसा मेरा वरदान और शक्ति तुम्हारे पास चारों युगों में रहेंगी। तुम्हारे मन्दिर स्थल पर बारह महीने श्रद्धालुओं और भक्तों का मेला लगा रहेगा।
कैसे पहुंचे खाटू श्याम जी मन्दिर तक
हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को राजस्थान में खाटू श्याम जी के मंदिर में दो दिन के बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से भी श्रद्धालु श्याम भक्त शामिल होते हैं। इस दौरान हारे का सहारा... है श्याम हमारा... प्रचलित भजन चारों तरफ गूंजता है। इस साल यह तिथि 4 मार्च को पड़ रही है।
यह प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर जयपुर से उत्तर दिशा में वाया रींगस से होकर 80 किलोमीटर दूर पड़ता है। दिल्ली, अहमदाबाद, जयपुर आदि से आने वाले यात्रियों को सर्वप्रथम इसी रींगस से होकर जाना पड़ता है। रींगस से ही सभी श्रद्धालु भक्तजन खाटू श्याम मंदिर के लिए जीप, बस या पैदल प्रस्थान करते हैं। खाटू में श्यामजी का छोटा सा मन्दिर है लेकिन उसकी मान्यता राजस्थान के अन्य धार्मिक स्थलों से कम नही है। मन्दिर के आसपास की साफ-सफाई और रखरखाव की व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं है हालांकि मन्दिर से पहले कई धार्मिक ट्रस्टों के गेस्ट हाउस और धर्मशाला आदि बन चुके हैं लेकिन मन्दिर की साफ-सफाई श्यामकृपा पर ही चल रही है।
Source :
महाभारत युद्ध के चश्मदीद
रविवार, 19 फ़रवरी 2012
सनातनी और आर्य समाजी मतानुसार गायत्री मंत्र का अर्थ Gayatri Mantra
गायत्री मंत्र (मूल संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद सहित)
विशेष नोट : प्राथमिक स्तर से लेकर दसवीं तक की मेरी पढ़ाई-लिखाई समर्थ शिक्षा समिति द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर एवं सरस्वती बाल मंदिर की नई दिल्ली स्थित हरि नगर शाखा में हुई... शिशु मंदिर के नाम में किसी का नाम जुड़ा था या नहीं, याद नहीं, परंतु बाल मंदिर की हमारी शाखा का पूरा नाम महाशय चूनीलाल सरस्वती बाल मन्दिर था...
हमारे विद्यालय की प्रार्थना सभा में प्रात:कालीन मंत्र, दो सरस्वती वन्दना (एक हिन्दी में तथा एक संस्कृत में), श्रीमद्भगवद्गीता के 10 श्लोकों का पाठ किया जाता था, जिनमें से कुछ वर्ष के उपरांत दो श्लोक बदल दिए गए थे (मैंने सभी 12 श्लोक यहां दिए हैं, और इंटरनेट पर होने का लाभ उठाते हुए सभी के अर्थ भी लिख दिए हैं)...
हमें विद्यालय से ही प्रार्थना की एक पुस्तिका (उसका नाम जहां तक याद है, 'अमृतवाणी' था) मिलती थी, जिसमें सभा के दौरान पढ़ी जाने वाली सभी प्रार्थनाएं प्रकाशित जाती थीं... 'अमृतवाणी' तो मुझे नहीं मिल पाई, परंतु गर्वान्वित हूं कि सिर्फ स्मृति के सहारे आज 21 वर्ष बाद भी लगभग सभी प्रार्थनाएं तलाश कर सका, या न मिलने की स्थिति में टाइप कर सका...वैसे, विद्यालय की प्रार्थना सभा में कुछ वर्षों तक 'ऐक्य मंत्र' तथा 'गायत्री मंत्र' का भी पाठ हुआ... 'ऐक्य मंत्र' कतई याद नहीं है, परंतु 'गायत्री मंत्र' यहां इस ब्लॉग पर भावार्थ सहित आपको मिल जाएगा...और हां, प्रार्थना सभा के अंत में सोमवार से शुक्रवार तक राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्...' तथा शनिवार को राष्ट्रीय गान 'जन गण मन...' का पाठ भी होता था, परंतु उन्हें यहां टाइप नहीं कर रहा हूं, क्योंकि वे बहुत-सी वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं... विद्यालय में प्रात:कालीन प्रार्थना सभा के अतिरिक्त भोजनावकाश होने पर भोजन मंत्र, तथा विद्यालय की छुट्टी हो जाने से तुरंत पहले सायंकालीन प्रार्थना का पाठ भी अनिवार्य था, सो, वे भी आपके सामने हैं...
ॐ भूर्भुव स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात
गायत्री मंत्र हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है, जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है... यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है... इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है, इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है... ऐसा माना जाता है कि इसके उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है...
शाब्दिक अर्थ
ॐ : सर्वरक्षक परमात्मा
भू: : प्राणों से प्यारा
भुव: : दुख विनाशक
स्व: : सुखस्वरूप है
तत् : उस
सवितु: : उत्पादक, प्रकाशक, प्रेरक
वरेण्य : वरने योग्य
भुर्ग: : शुद्ध विज्ञान स्वरूप का
देवस्य : देव के
धीमहि : हम ध्यान करें
धियो : बुद्धियों को
य: : जो
न: : हमारी
प्रचोदयात : शुभ कार्यों में प्रेरित करें
भावार्थ : उस सर्वरक्षक प्राणों से प्यारे, दु:खनाशक, सुखस्वरूप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें... तथा वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें...
by Ramesh K Bobade on Monday, October 10, 2011 at 10:32pm
-----------------------------------------------
गायत्री मंत्र जाप की महिमा
संध्या का प्रयास का प्रधान अंग गायत्री जप ही है। गायत्री को हमारे वेद शास्त्रों में वेदमाता कहा गया है। गायत्री की महिला चारों ही वेद गाते हैं, जो फल चारों वेदों के अध्ययन से होता है, वह एक मात्र गायत्री मंत्र के जाप से हो सकता है, इसलिए गायत्री मंत्र की शास्त्रों में बड़ी महिमा गाई गई है। भगवान मनु कहते हैं कि जो पुरूष प्रतिदिन आलस्य त्याग कर तीन वर्ष तक गायत्री का जप करता है, आकाश की तरह व्यापक परब्रह्य को प्राप्त होता है।
जप तीन प्रकार का होता है-वाचिक, उपांशु एवं मानसिक। इन तीनों यज्ञों में जप उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है। जप करने वाला पुरूष आवश्यकतानुसार ऊंचे, नीचे और समान स्वरों में बोले जाने वाले शब्दों का वाणी से सुस्पष्ठ उच्चारण करता है, वह वाचिक जप कहलाता है, इसी प्रकार जिस जप में मंत्र का उच्चारण बहूत धीरे-धीरे किया जाए, होंठ कुछ-कुछ हिलते रहें और मंत्र का शब्द कुछ-कुछ स्वयं ही सुने, वह जप उपांशु कहलाता है। बुद्धि के द्वारा मंत्राक्षर समूह के प्रत्येक वर्ण, प्रत्येक पद और शब्दार्थ का जो चिंतन एवं ध्यान किया जाता है, वह मानस जप कहलाता है। अधिक से अधिक 1000 साधारण तथा एक सौ अथवा कम से कम दस बार जो द्विज गायत्री का जप करता है, वह पापों में लिप्त नहीं होता।
महाभारत शांति पर्व के 119 वें अध्याय में गायत्री की महिमा एक बड़ा सुंदर उपाख्यान मिलता है। कौशिक गोत्र में उत्पन्न हुआ पिप्लाद का पुत्र एक बड़ा तपस्वी धर्मनिष्ठा ब्राह्मण था। वह गायत्री का जप किया करता था। लगातार एक हजार वर्ष तक गायत्री का जप करने पर गायत्री देवी ने उसको साक्षात-दर्शन देकर कहा कि मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ. परंतु उप समय पिप्लाद का पुत्र जप कर रहा था, चुपचाप जप करने में लगा रहा और गायत्री देवी को कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वेदमाता गायत्री देवी उसकी इस जपनिष्ठा पर और भी अधिक प्रसन्न हुई और उसके जप की प्रशंसा करती वहीं खड़ी रहीं। जिनकी साधना में ऐसी दृढनिष्ठा होती है कि साध्य चाहे भले ही छूट जाए, परंतु साधन नहीं छूटना चाहिए, उनसे साधन तो छूटता ही नहीं, साध्य भी श्रद्धा और प्रेम के कारण उनके पीछे-पीछे चलता है। साधन-निष्ठा ऐसी महिमा है।
जप की संख्या पूरी होने पर वह धर्मात्मा ब्राह्मण खड़ा हुआ और देवी के चरणों में गिरकर उनसे यह प्रार्थना करने लगा कि यदि आप मुझे पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके मुझे यह वरदान दीजिए कि मेरा मन निरंतर जप में लगा रहे और जप करने की मेरी इच्छा उत्तरोत्तर बढ़ती रहे। गायत्री देवी उस ब्राह्मण के निष्काम भाव को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और तथास्तु कहकर अन्तर्ध्यान हो गई। ब्राह्मण ने फिर जप प्रारंभ किया। देवताओं के 100 वर्ष और बीत गए। पुनश्चरण के समाप्त हो जाने पर साक्षात धर्म ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण को दर्शन दिए और स्वर्गादिलोक मांगने को कहा, परंतु ब्राह्मण ने धर्म को भी यही उत्तर दिया कि मुझे सनातन लोकों से क्या प्रयोजन है, मैं तो गायत्री का जप करके आनंद करूंगा। इतने में ही काल मृत्यु और यम ने भी उसकी तपस्या की बड़ी प्रशंसा की।
उसी समय तीर्थ यात्रा के निमित निकले हुए राजा इक्ष्वाकु भी वहां पहुंचे, राजा ने उस तपस्वी ब्राह्मण को बहुत-सा धन देना चाहा, परंतु ब्राह्मण ने कहा कि मैंने प्रवृत्ति धर्म अंगीकार किया है, अतः मुझे धन की कोई आवष्यकता नहीं है। तुम्हें कुछ चाहिए तो मुझ से मांग सकते हो। मैं अपनी तपस्या के द्वारा तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करू। राजा ने उस तपस्वी ब्राह्मण अपने जप का पूरा फल मांग लिया। तपस्वी ब्राह्मण अपने जप का पूरा फल राजा को देने के लिए तैयार हो गया, किंतु राजा उसे स्वीकार करने में हिचकिचाने लगा। बड़ी देर तक विवाद चलता रहा। ब्राह्मण सत्य की दुहाई देकर राजा को मांगी वस्तु स्वीकार करने के लिए आग्रह करता था और राजा क्षत्रियत्व की दुहाई देकर उसे लेने में धर्म की हानि बदले में राजा के पुण्य-फल को ब्राह्मण स्वीकार कर ले। उसके निश्चय को जानकर विष्णु आदि देवता वहीं उपस्थित हुए और दोनों के कार्य की सराहना करने लगे। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
अंत में ब्राह्मण और राजा दोनों योग-द्वारा समाधि में लीन हो गए। ब्राह्मण ने कहा कि जो फल योगियों को मिलता है, वही जप करने वालों को भी मिलता है। इसके बाद ब्राह्मण ने उस तेज को नित्य आत्मा और ब्रह्या की एकता का उपदेश दिया तथा उस तेज ने ब्रह्मा के मुख में प्रवेश किया और राजा ने भी ब्राह्मण की भांति ब्रह्या के शरीर में प्रवेश किया। इस प्रकार शास्त्रों में गायत्री जप का महान फल बतलाया गया है। कल्याण-कारी को चाहिए कि वे इस स्वल्प प्रयास से साध्य होने वाले संध्या और गायत्री रूप साधन के द्वारा शीघ्र मुक्ति लाभ करें।
गायत्री मंत्र में समाहित शक्तियां:-
हम नित्य गायत्री मंत्र का जाप करते हैं। लेकिन उसका पूरा अर्थ नहीं जानते। गायत्री मंत्र की महिमा अपार हैं। गायत्री, संहिता के मुताबिक, गायत्री मंत्र में कुल 24 अक्षर हैं। ये चौबीस अक्षर इस प्रकार हैं- 1. तत् 2. स 3. वि 4. तु 5. र्व 6. रे 7. णि 8. यं 9. भ 10. गौं 11. दे 12. व 13. स्य 14. धी 15. म 16. हि 17. धि 18. यो 19. यो 20. नः 21. प्र 22. चो 23. द 24. यात्
वृहदारण्यक के मुताबिक हम उक्त शब्दावली का भाव इस प्रकार समझते हैं-
तत्सवितुर्वरेण्यं- अर्थात् मधुर वायु चलें, नदी और समुद्र रसमय होकर रहें। औषधियां हमारे लिए मंगलमय हों। द्युलोक हमें सुख प्रदान करें।
भगों देवस्य धीमहि- अर्थात् रात्रि और दिन हमारे लिए सुखकारण हों। पृथ्वी की रज हमारे लिए मंगलमय हो।
धियो यो नः प्रचोदयात्- अर्थात् वनस्पतियां हमारे लिए रसमयी हों। सूर्य हमारे लिए सुखप्रद हो, उसकी रश्मियां हमारे लिए कल्याणकारी हों। सब हमारे लिए सुखप्रद हों। मैं सबके लिए मधुर बन जाऊं। गायत्री मंत्र का अगर हम शाब्दिक अर्थ निकालें तो, उसके भाव इस प्रकार निकलते हैं-तत् वह अनंत परमात्मा, सवितुः-सबको उत्पन्न करने वाला, वरेण्यम्ः-ग्रहण करने योग्य या तृतीय के लायक, भर्गों-सब पापों का नाश करने वाला, देवस्यः-प्रकाश और आनंद देने वाले दिव्य रूप ऐसे परमात्मा का, धीमहिः-हम सब ध्यान करते हैं, धियः-बुद्धियों को, यः-वह परमात्मा, नः-हमारी, प्रचोदयात्ः-धर्म, काम, मोक्ष में प्रेरणा करके, संसार से हटकर अपने स्वरूप में लगाए और शुद्ध बुद्धि प्रदान करे।
http://www.pravakta.com/the-glory-of-gayatri-mantra-chanting
-------------------------------------------
वैदिक मन्त्र | आर्य समाज नगरा ,झाँसी
गायत्री मन्त्र
ओ3म् द्यौ: शांतिरन्तरिक्षँ शांति: पृथ्वी शांतिराप:
शांतिरोषधय: शांति:। वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा:
शांतिर्ब्रह्म शांति: सर्वँ शांति: शांतिरेव शांति: सा मा
शांतिरेधि। ओ3म् शांति: शांति: शांति: ।।
सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत् ।।
http://aryasamajjhansi.blogspot.in/2011/10/blog-post.html
---------------------------------------------------------------
Gayatri Mantra Detailed Word by Word Meaning
The Gayatri Mantra consists of twenty-four syllables - three lines of eight syllables each. The first line (Aum Bhur Bhuvah Swah) is considered an invocation, and is not technically a part of the original Gayatri Mantra as it appears in the Upanishads. Gayatri is also referred to as a Vedic poetic meter of 24 syllables or any hymn composed in this meter. Hence, there exists a whole family of Gayatri Mantras, which serve as meditative aids to pray for the blessings of a particular personal God.
Bhargo Devasya Dhimahi, Dhiyo Yo Nah Prachodayat
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं । भर्गो देवस्य धीमहि, धीयो यो न: प्रचोदयात् ।।
A basic translation can be given as...
Oh God, the Protector, the basis of all life, Who is self-existent, Who is free from all pains and Whose contact frees the soul from all troubles, Who pervades the Universe and sustains all, the Creator and Energizer of the whole Universe, the Giver of happiness, Who is worthy of acceptance, the most excellent, Who is Pure and the Purifier of all, let us embrace that very God, so that He may direct our mental faculties in the right direction.
The Four Parts of the Gayatri Mantra
Aum Bhur Bhuvah Swah (ॐ भूर्भुव: स्व:)
1. AUM (ॐ), the Supreme name of God. A full explanation of this has been given in a related article(http://www.eaglespace.com/spirit/aum_pranava.php).
BHUR BHUVAH SWAH. These three words collectively are known as the "Mahavyahriti". They express the nature of God, and demonstrate his inherent qualities.
- 2. BHUR (भूर्)
- Firstly, the word Bhur implies existence. God is self-existent and independent of all. He is eternal and unchanging. Without beginning and without end, God exists as a continuous, permanent, constant entity. Secondly, the word Bhur can also mean the Earth, on which we are born and sustained. God is the provider of all, and it is through His divine will that we our blessed with all that we require to maintain us through our lives. Finally, Bhur signifies Prana, or life (literally, breath). God is That which gives life to all. Whilst He is independent of all, all are dependent on Him. It is God who has given us life, God who maintains us throughout our lives, and God alone who has the ability to take away our life, when He so chooses. The only permanent entity, all others are subject to His own will
- 3. BHUVAH (भुव:)
- Bhuvah describes the absolute Consciousness of God. God is self-Conscious as well as being Conscious of all else, and thus is able to control and govern the Universe. Also, the word Bhuvah relates to God's relationship with the celestial world. It denotes God's greatness - greater than the sky and space, He is boundless and unlimited. Finally, Bhuvah is also indicative of God's role as the remover of all pain and sufferings (Apaana). We see pain and sorrow all around us. However, through supplication to God, we can be freed from that pain and hardship. God Himself is devoid of any pain. Though He is Conscious of all, and is thus aware of pain, it does not affect Him. It is our own ignorance that makes us susceptible to the effects of Maya, or illusion, which causes us to feel pain. Through true devotion to God, we can be freed from the clutches of Maya, and thus be rid of pain and sorrow.
- 4. SWAH (स्व:)
- Swah indicates the all-pervading nature of God. He is omnipresent and pervades the entire multi-formed Universe. Without Form Himself, He is able to manifest Himself through the medium of the physical world, and is thus present in each and every physical entity. In this way, God is able to interact with the Universe created by Him, and thus sustain and control it, ensuring its smooth and proper running and function.
TAT SAVITUR VARENYAM (तत्सवितुर्वरेण्यं)
- 5. TAT (तत् s.1)
- Literally, this word means "that", being used in Sanskrit to denote the third person. It is also mentioned in the Bhagavad Gita by Sri Krishna Himself, where He implies the selfless nature of the word. Being used in the third person, the word has implicit in it an idea of selflessness. Sri Krishna uses it to imply the selfless nature of charity (charity, or a gift, being used as an analogy for worship, in the form of action, implying that action should be preformed without regard to its fruits, but simply out of devotion and sense of duty, or Dharma). Tat then is used here in the Gayatri Mantra to indicate that the worshipper is referring to [that] God, and that the praise being offered to God in the prayer is purely directed towards Him, without thought of gaining any personal benefit from that praise.
- 6. SA-VI-TUR (सवितुर् s.2-4)
- Savita, from which Savitur is derived, is another name of God, this being the reason that the Gayatri Mantra is often known as the Savitri Mantra. The implication of Savita is of God's status as the fountain, the source of all things. It is through His Divine Grace that the Universe exists, and so this word sums up the Mahavyahriti, by describing God's ability to create the Universe and sustain it, as well as, at the right time, bring about its dissolution.
- 7. VA-RE-NY-AM (वरेण्यं s.5-8)
- Varenyam signifies our acceptance of God, and can be translated as meaning "Who is worthy". Ever ready to obtain all the material riches of the world, more often than not, they are a disappointment once they have been achieved. God however is the one who, once realized and achieved, has the ability to truly satisfy. We therefore accept Him as the Highest reality, and it is to Him that we dedicate our efforts.
BHARGO DEVASYA DHIMAHI (भर्गो देवस्य धीमहि)
This triplet is a further description of the attributes and qualities of God - His functional and instrumental qualities, rather than intrinsic qualities - and through those qualities, His relationship to us.
- 8. BHAR-GO (भर्गो s.1,2)
- Bhargo is taken to signify the Glorious Light that is God's love and power. It indicates His complete purity - being absolutely pure Himself, God also has the ability to purify those that come into contact with Him. Thus, Bhargo is indicative of God's power to purify, and to destroy all sins and afflictions. In the same way as a metal ore placed into a fire will yield the pure metal, by merging with God, by realizing His Divine Form and establishing unity and oneness with Him, we can cleanse ourselves and be made pure by His Grace.
- 9. DE-VAS-YA (देवस्य s.3-5)
- The word Deva, from which this word is derived, has been translated by different people in many different ways. It is generally thought of as meaning simply "God". However, its meaning is more complex than that.
- 10. DHI-MA-HI (धीमहि s.6-8)
- Meaning to meditate and focus our mind on God. Meditation on God implies that we remove all other thoughts from our mind, since thoughts of the world render our mind impure, and thus we are unable to conceptualize the absolute purity of God. We must be able to concentrate, and direct our mental energies towards the task in hand - which is communion with God.
DHIYO YO NAH PRACHODAYAT (धीयो यो न: प्रचोदयात्)
Prayer is carried out for four main reasons:
- to praise and glorify God;
- to thank God;
- to ask forgiveness from God;
- or to make a request from God.
Having carried out the other three parts (praise of His greatness, thanks for His generosity in Creation and maintaining us through our lives, and forgiveness by demonstrating our awareness of our own impurity, which we have realized is present and must be cleansed through contact with God), this part is now our request from God. Since our soul is the Light of Life within us, and that acts on our body via the medium of the brain, we ask God to make this contact pure and righteous. The soul is of course inherently pure, being itself Divine in nature. The body is under the complete control of the mind. The link is the mind, which is affected not only by the soul, but also the outside world. We ask in these four words that God help us to improve our intellect, and guide it towards what is right.
- 11. DHI-YO (धीयो s.1,2)
- Sanskrit for "intellect", this is the essence of this part of the Gayatri Mantra. Having firmly set God in our hearts, we now must try to emphasize His presence and influence on our mind and intellect.
- 12. YO (यो s.3)
- Meaning "Who" or "That", Yo signifies yet again that it is not to anyone else that we direct these prayers, but to God alone. Only God is worthy of the highest adoration, only God is perfect and free from all defects. It is That God to Whom we offer these prayers.
- 13. NAH (न: s.4)
- Nah means "Ours", and signifies the selflessness of the request we make of God in this part of the Gayatri Mantra. We offer this prayer, and make the request of God, not simply for ourselves, but for the whole of humanity. We seek the uplift of the whole of society. Hindu philosophy has since the beginning recognized the concept of "Vasudhaiva Kutumbakam" - "The whole world is one big family". Thus, we pray not only for ourselves, but for each and every member of that great family, that we may all benefit from the greatness and generosity of the All-loving God.
- 14. PRA-CHO-DA-YAT (प्रचोदयात् s.5-8)
- Prachodayat, the final word of the Gayatri Mantra, rounds off the whole mantra, and completes the request we make of God in this final part. This word is a request from God, in which we ask Him for Guidance, and Inspiration. We ask that, by showing us His Divine and Glorious Light (cf. BHARGO), He remove the darkness of Maya from our paths, that we are able to see the way, and in this manner, we ask Him to direct our energies in the right way, guiding us through the chaos of this world, to find sanctuary in the tranquility and peace of God Himself, the root of all Happiness, and the source of true Bliss.
- Gayatri Mantra Summary, Origins - A detailed summary of the Gayatri mantra, origins in the Upanishads (http://www.eaglespace.com/spirit/gayatri.php)
- Gayatri Mantra Audio in mp3 - Audio Clips of the Gayatri Mantra (http://www.eaglespace.com/spirit/gayatri_audio.php)
- Goddess Gayatri is closely linked to Saraswati (goddess of education) and Lakshmi (goddess of wealth) (http://www.eaglespace.com/spirit/gayatrig.php)
http://www.eaglespace.com/spirit/gayatribywords.php
---------------------------------------------------------
श्रीगायत्री मंत्र – ॠग्वेद, यजुर्वेद, एवं सामवेद में
वैदिक मंत्रों में सुख्यात तथा सर्वाधिक चर्चित मंत्र श्रीगायत्री मंत्र है जिसके मंत्रद्रष्टा ॠषि विश्वामित्र बताये जाते हैं । मान्यता है कि वैदिक मंत्रों का अंतर्ज्ञान अलग-अलग ॠषियों को समय के साथ होता रहा और कालांतर में मुनि व्यास ने उन्हें तीन वेदों के रूप में संकलित एवं लिपिबद्ध किया । उक्त मंत्र 24 मात्राओं के गायत्री छन्द में निबद्ध है और शायद इसीलिए इसे गायत्री मंत्र नाम दिया गया है ।
यह एक रोचक तथ्य है कि श्रीगायत्री मंत्र का उल्लेख तीनों प्रमुख वेदों में है और इस प्रकार लिपिबद्ध किया गया है-
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
(1) यह ॠग्वेद-संहिता के मण्डल 3, सूक्त 62 में 10वां मंत्र (ॠचा) है ।
(2) यजुर्वेद-संहिता के अध्याय 3 में यह 35वें मंत्र (यजुः) के रूप में उल्लिखित है और इसका पुनरुल्लेख अध्याय 22 में 9वें तथा अध्याय 30 में 2रे मंत्र के तौर पर भी हुआ है ।
(3) सामवेद का यह 1462वां (अध्याय 3, खण्ड 4, मंत्र 3) मंत्र (साम) है ।
माना जाता है कि उक्त तीनों वेदों का संबंध अध्यात्म तथा दर्शन से रहा है । ॠग्वेद को पारलौकिक ज्ञान का भंडार माना जाता है जब कि यजुर्वेद यज्ञादि अनुष्ठानों को संपन्न करने में प्रयुक्त मंत्रों का संग्रह है । धार्मिक अनुष्ठानों में गायन में प्रयुक्त मंत्रों का संकलन सामवेद क रूप में जाना जाता है । अथर्ववेद इन तीनों से हटकर है और इसमें लौकिक उपयोग की बातें संग्रहीत हैं, जैसे आयुर्विज्ञान, आयुधविज्ञान, अर्थशास्त्र इत्यादि से संबंधित जानकारी ।
ॠग्वेद-संहिता के श्रीमद्सायणाचार्यरचित भाष्य और यजुर्वेद-संहिता के श्रीमद्उमटाचार्य तथा श्रीमद्महीधर द्वारा रचित भाष्यों के अनुसार उक्त मंत्र की व्याख्या यूं की जा सकती हैः-
सविता (सवितृ) उस परमात्मा का संबोधन है जिससे समस्त सृष्टि का प्रसव हुआ है अर्थात् जिससे मूर्त एवं अमूर्त सभी कुछ उत्पन्न हुआ है । सभी पापों का भर्जन करने वाली उसकी सामर्थ्य या शक्ति को भर्ग कहा गया है । मंत्र में निहित भाव है- “उस सविता देवता के वरण किये जाने योग्य अर्थात् प्रार्थनीय भर्ग का हम ध्यान करें । वह सविता या उसका भर्ग जो हमारी बुद्धियों को (सत्कर्मों के प्रति) प्रेरित करता है ।” (तस्य सवितुः देवस्य वरेण्यं भर्गः (वयम्) धीमहि यः नः धियः प्रचोदयात् ।)
यहां इतना और कहना समीचीन होगा कि यजुर्वेद-संहिता के अध्याय 36 के मंत्र 3 का पाठ इस प्रकार है:-
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।
यह पहले उल्लिखित मंत्र से इस बात में भिन्न है कि उसके आरंभिक वाक्यांश ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ है । यह पदसमूह दरअसल श्रीगायत्री मंत्र का अनिवार्य भाग नहीं है । किंतु व्यवहार में लोग उपर्युक्त स्वरूप में ही इस मंत्र को जानते आ रहे हैं । आरंभ के ये तीन शब्द ‘भूः’, ‘भुवः’ एवं ‘स्वः’ व्याहृतियां कही जाती हैं और शाब्दिक दृष्टि से ये क्रमशः पृथ्वीलोक, अंतरिक्षलोक तथा स्वर्गलोक को इंगित करते हैं । वैदिक मान्यतानुसार पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोक के मध्य में अंतरिक्षलोक है ।
श्रीगायत्री मंत्र के जाप में मंत्र के आरंभ में ओंकार शब्द तथा उक्त तीनों व्याहृतियों अर्थात् ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ के उच्चारण की प्रथा है । ‘ॐ’ परमात्मा का द्योतक है और ‘भूर्भुवः स्वः’ उसकी संपूर्ण सृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है । इनके उच्चारण द्वारा कदाचित् परमात्मा और उसकी सृष्टि को संबोधित किया जाता है, अथवा उन पर घ्यान केंद्रित किया जाता है । – योगेन्द्र
http://vichaarsankalan.wordpress.com/tag/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0/
--------------------------------------------------------
गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान
ऊँ भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यंभर्गोदेवस्य धीमहि
धियो योन: प्रचोदयात्
गायत्री को वेदों की माता कहा जाता है... कहते हैं गायत्री की व्याख्या करने के लिए ही ब्रह्मा ने 4 वेदों की रचा की थी। इन वेदों से शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद, पुराण और समृति आदि का निर्माण हुआ। इन्हीं ग्रंथों से शिल्प, वाणिज्य, शिक्षा, रसायन, वास्तु और संगीत आदि 64 कलाओं का निर्माण हुआ। इस प्रकार गायत्री समस्त ज्ञान विज्ञान की जननी हुई। जिस प्रकार बीज में विशालकाय बरगद का वृक्ष छिपा होता है ठीक वैसे ही गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में संसार का पूरा ज्ञान छिपा है। जगत और कुछ भी नहीं बल्कि गायत्री का ही विस्तार है। प्रतिदिन गायत्री मंत्र का उच्चारण और जप करने से आत्मबल बढ़ता है... एकाग्रता बढ़ती है... और व्यक्ति अधिक शांत होता जाता है। यूं तो हजारों साल लंबे सनातन धर्म में ऋषियों ने बहुत से प्रभावशाली मंत्रों का अविष्कार किया है...ज्यादातर बीज मंत्र ऐसी ध्वनियां होती हैं जिन्हें उचित तरीके से उच्चारित करने पर अदृश्य शक्तियां जागृत होती हैं... ठीक यही गायत्री मंत्र के साथ भी है... इसके उच्चारण से भी शक्ति प्रकट होती है खास बात तो ये है कि इस मंत्र के शब्दों का एक सुंदर अर्थ भी विधमान है।
ऊँ = स्वर जो आध्यात्म से भरा है, मूलध्वनि है
भू = धरती या भूमि
भुर्व:= वातावरण
स्व:= अंतरिक्ष या स्वर्ग
तत् = वह
सवितुर = सूर्य या तेजोमय
वरेण्यं = नमन या वरण करने योग्य
भर्गो = महत्ता या शक्ति
देवस्य = भगवान
धीमहि = ध्यान करना
धियो = ज्ञान
यो = कौन, उनके सिवा
न: = हमारे या हमें
प्रचोदयात् = देने का आग्रह
भाव - परम पिता परमेश्वर, जो धरती, आकाश और ब्रह्मांड के स्वामी हैं... जो दिव्यमान ज्योति हैं... और नमन के योग्य हैं... उस शक्तिमान देव का मैं ध्यान करता हूं... और उनसे ज्ञान की याचना करता हूं।
http://www.dharamastha.com/Post.aspx?post=2
